रविवार, 25 अगस्त 2013

सिन्धी भाषा

सिन्धी भाषियों के लिए एक खबर है।  अच्छी है की ख़राब खुद ही जाने और निर्णय ले. साहित्य अकदमी के पुरस्कारों की घोषणा हुई है. इस बार सिन्धी भाषा के लिए किसी को ये पुरस्कार  नहीं मिला है.

ऐसा तो होना ही था।  हम सिन्धी लोग सिन्धी बोलना ही नहीं चाहते हैं , पढेंगे  क्या खाक. हम सिन्धी बोलना और पढ़ना  अपनी हेटी  समझते है.  बचे को घर में हीनी सिखिय जाती है की स्कूल जायेगा तो क्या बोलेगा. 
ऐसा सिर्फ हम सिन्धी परवारों में ही होता है. बंगाली, गुजराती या फिर पंजाबी परिवार अपने बच्चों को सिर्फ अपनी भाषा  सबसे पहले सिखाते है. 

हम सिन्धी लोग ऐसी हर चीज़ में पिचादना चाहते है. आज बहुत सारे सिन्धी साहित्य अकादमी के पधादिकारी या अन्य सिन्धी भासः से जुडी संस्थाओं के पदाधिकारी स्वयम अपने बच्चों से या फिर बच्चों के बच्चों से एनी भाषा में बात करते हैं पर सिन्धी में नहीं करते है. पहले तो हमारे परिवारों  में मंगलवार और शनिवार को सिन्धी के रेडियो कार्यक्रम बड़े छाव से सुने जाते थे लेकिन आज कयिओं को पता भी नहीं होगा कि ऐसा कोई कार्यक्रम आता  भी है. 

जैसे हम अपने अगली पीढ़ी को आगे बड़ा रहें हैं बिन अपनी सिन्धी भाषा के बहुत जल्द  सिन्धी भाषा समाप्त हो जाएगी। हम भारत में रहने वाले सिन्धी ही सिर्फ अपनी भाषा के प्रयोग में सह्र्माते हिं या हिचकिचाते हैं जबकि भारत से बहार रहें वाले सभी सिन्धी चाहे सिंगापूर में हो या दुबई में या फिर इंडोनेशिया, फिलिपींस या अमरीका में वे लोग सिन्धी का प्रयोग करते हैं और बड़ी खूबी से करते है. हम भारतीय  सिंधियों को भी अपनी इस कमी पर विचार करना चाहिए और अपनी भाषा के प्रयोग को बढावा देना चाहिए 

सिन्धी अबाणी  बोली मिठडी अबाणी  बोली



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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

बिजली

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर और हिन्द की साठ साला से ऊपर सरकार पर वे लोग बीबीसी की निचे लिखे लिंक पर जाएँ और अपने आपको सह्चै से अवगत करावें


http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130816_indian_villages_offgrid_power_vt.shtml


इस लिंक  के अनुसार

भारत की स्वतंत्रता के 66 साल बीत गए हैं. इसके बाद भी एक अनुमान के मुताबिक देश की एक अरब 20 लाख आबादी के आधे से ज़्यादा लोगों को अभी बिजली नहीं मिल सकी है.

कुछ ही सालों में 60 साल की होने जा रही  महिला के पास रोशनी के नाम पर सिर्फ जलती मोमबत्ती और चूल्हे की आग ही हैं.

सुखरानी के गाँव में बिजली नहीं है, क्योंकि ये कभी यहाँ तक पहुंची ही नहीं.

चेहरे से पसीना पोंछते हुए सुखरानी कहती हैं, " मैं कभी बिजली का बल्ब नहीं देखा."

उन्होंने बताया, "जिस गाँव में मेरा जन्म हुआ था, उसमे भी बिजली नहीं थी और शादी के बाद यहाँ आए तो यहाँ भी बिजली नहीं मिली.

पूर्वा भारत के उन हज़ारों गाँवों में से एक है, जहाँ अब तक बिजली नहीं पहुँच पाई है या फिर जहाँ बिजली किश्तों में आती है.

सुखरानी की तरह ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है.

वह कहती हैं, मैंने सुना है कुछ लोगों के पास बिजली है, लेकिन मैंने कभी नहीं देखी, इसलिए मुझे नहीं पता कि यह किस काम आती है."


हम ऐसे देश में रहते हैं जहाँ आज़ादी के साठ साल बाद भी बिजली, पानी और आधारभूत सुविधाओं का अभाव  है . ऐसे देश में हमारे मंत्री, मुख्यमंत्री लेपटोप और न जाने क्या क्या बांटने की बातें करते हैं

धन्य है हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के काबिल मिनिस्टर .




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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

प्रधानमन्त्री बोले


यदि हमारे प्रधानमंत्री आदरणीय मनमोहन सिंह जी का वर्ष में एक बार बोलने वाले कार्यक्रम का भाषण सुना जाये तो क्या बात है.

हमारे देश में जो कुछ प्रगति हुई है वो महज नों साल में ही होना चालू हुई है. लगता है कोंग्रेस के बाकि के 50 -52  वर्षों में  कुछ हुआ ही नहीं होगा।  वे अपने भाषण से क्या जताना चाहते हैं वे ही जाने। उनकी बातों से  लगता है की  नेहरू ,शास्त्री ,इंदिरा गाँधी ,राजीव गाँधी और नरसिम्हा राव के शासन  में कुछ नहीं किया गया था। 

प्रगति होना सिर्फ पिछले नों सालों में ही प्रारम्भ हुआ है।  इन्होने कुछ नए कार्य अभी आरम्भ ही किये हैं इसलिए अगले दस सालों का प्रारूप भी बनाया है. आपका दिल चाहे तो इनको एक बार और  सरकार बनाने  दीजियेगा और देखिएगा आपके रुपये की, आपकी रसोई की और आपके अपने बजट की क्या हालत कर डालते है

जिस देश में 67  सालों  में न बिजली पहुंचा पाये ,न सड़के बना पाये ,न पीने का पानी मुहैया  करा सके वहाँ  सिर्फ लेप टॉप बांटने से क्या हासिल करना चाहते है.

67  सालों से विकसशील देश बने हें है  और अगले दस साल इन्हें दिए गए तो आपको सुपर पॉवर बनाकर दिखला देंगे।  इंशा अल्लाह 

जो भी बोले, जैसा भी बोले , अच्छा बोले या फिर बुरा बोले पर बोले तो सही। 

सही कहते हैं : हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है 

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