बदती महंगाई में सोती आत्मा
पेट्रोल डीज़ल पर कर घटाऊँ या नहीं यही सोच रही है मेरी आत्मा. एक आवाज़ आती है की जल्दी से घटा दूँ पर फिर आवाज़ आती है की मुझे क्या फरक पड़ता है. आम आदमी की समस्या है आम आदमी सुलझा लेगा. पेट्रोल महंगा हो या डीज़ल, गैस महँगी हो मेरा क्या? वैसे भी आज़ादी के बाद से आम आदमी को तो आदत सी पड़ गयी है सब कुछ सहने की. कितीं ही महंगाई हो कितनी ही तकलीफें हो आम आदमी तो आम आदमी है, सब कुछ सह लेता है और ये बोझ ही सहाकर लेगा. इसलिए मैं भी अपनी आत्मा की आवाज़ को दबाकर अपने राज कार्य में व्यस्त हो जाता हूँ और फिर भूल जाता हूँ की पेट्रोल, डीज़ल, गैस, सब्जियां और सभी रोज़मर्रा की ज़रूरत वाली चीजें महँगी हो गयी हैं और रोज़ महंगाई बाद रही है. आम आदमी का कुछ भी हो हम तो मज़े से आम खाते रहेंगे.
अशोक गहलोत की आत्मा (जून २०११ में डीज़ल, गैस के भाव बदने के बाद)
लेबल: महंगाई

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