मनमोहन की पाती मनमोहन के नाम
प्रिय मनमोहन
अब जब से तुम प्रधान मंत्री बने हो तब से मेरी आवाज़ को सुनकर भी अनसुना कर देते हो. पह्ल्के पांच साल कि मज़बूरी तो समझ आती है कि तुम वामपंथियो के दबाव में थे. तुम्हारी इच्छा तो बहुत थी कुछ कर गुजरने की , तुम बहुत सारे मुलभुत परिवर्तन करने की पूरी मंशा रखते थे पर वामपंथियो ने कुछ बड़ा करने नहीं दिया और तुम बहुत सरे कदम उठाने से वंचित रह गए. मैं भी तुम्हारी मज़बूरी को देखती रही और जहर के गुंट पीती रही. हालाँकि मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों के बाद मैं बहुत चिलायी थी कि ये सुनहरा मौका है कुछ बड़ा कर डालो पर तुमने मेरी एक न मानी और एक अपनी असली ताकत दिखाने का एक अच्छा मौका गवां दिया. कितने बड़े बड़े पुलिस अधिकारी कुर्बान हो गए पर तुमने कुछ नहीं किया/ फिर बयां बजी करते वक्त मैंने तुमेह बहुत रोअक पर तुमने मेरी एक न सुनी और वाही घिसे पिटे बयां देते रहे कि हम आतंकवाद से डरने वाले नहीं है, आतंकवाद का डटकर मुकाबला करेंगे, दोषियों को बक्शा नहीं जायेगा. आज लगभग तीन बरस होने वाले हैं और आज तक दोषियों को कोई सजा नहीं मिली है. हाँ तुमने अमरीका से ज़रूर गुहार लगाई लेकिन क्या मिला. तुम्हें मैंने कितना कहा कि ऐसे गिडगिडाने से कुछ मिलने वाला नहीं है. मनमोहन तुम्हे कुछ कठोर निर्णय तो लेने ही होंगे, कुछ कदम स्वयं उठाने ही होंगे
शुभ आशीष . मैं पिछले पांच सात वर्षों से देख रही हूँ तुम थोड़े से भीरु से हो गए हो.मैं अच्छी तरह से जानती हूँ की तुम पहले ऐसे नहीं थे . मैंने बचपन से तुम्हे देखा है. तुम हमेशा नया करने की उमंग लिए, कुछ नया और अच्छा करने को आतुर और सबको साथ लेकर आगे चलने की हिम्मत रखते थे. तुमने प्रोफेसरी की ,रिज़र्व बैंक के गवर्नर रहे या और किसी सरकारी महकमे में ऊँचे पदों पर रहे, हमेशा दबंग तरीके से अपना काम किया और उसी तरह से दूसरे लोगों से काम करवाया. जिन दिनों तुम ऑक्सफोर्ड में पी एच डी कर रहे थे तब बड़ा अच्छा लगता था . कितने अच्छे और नए नए विचार आते थे तुम्हारे दिमाग में. यदि थोडा सा संभ्रांत और सहज भाषा से हटकर शब्द का उपयोग करूँ तो एकदम "झकास".
तुम्हारे पुराने रूप में देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती थी. मेरा कोलर हमेशा ऊपर ही रहता था. मन ही मन बड़ी खुश होती थी कि परम पिता परमात्मा ने कितना अच्छा शरीर प्रदान किया है. की दिमाग पाया है सरदार जी का. लेकिन अब तुम कुछ निराश से करने लगे हो. ऐसा लगता है कि तुमने मुझ आ त्मा की आवाज़ सुनना ही बंद कर दिया है . में कुछ आश्चर्य में हूँ, कुछ अचंभित हूँ . बहुत सोचती हूँ कि तुम्हे आजकल हो क्या गया है ? मुझे लगता नहीं कि तुम वही मनमोहन हो जिसे मैंने दशकों से देखा है बल्कि जिसके साथ मैं सत्तर से भी ज्यादा सालों से जीवन को जिया है और जिसकी पल पल की खबर रखी है.
मनमोहन, जब तुम नरसिम्हा राव साब के साथ वित्त मंत्री थे तब भी तुम्हारी स्थिति अची खासी थी. हालाँकि तब भी तुम थोडा डगमगाए थे पर कुल मिलाके तुमने मेरी लाज जरुर रखी थी.
अब जब से तुम प्रधान मंत्री बने हो तब से मेरी आवाज़ को सुनकर भी अनसुना कर देते हो. पह्ल्के पांच साल कि मज़बूरी तो समझ आती है कि तुम वामपंथियो के दबाव में थे. तुम्हारी इच्छा तो बहुत थी कुछ कर गुजरने की , तुम बहुत सारे मुलभुत परिवर्तन करने की पूरी मंशा रखते थे पर वामपंथियो ने कुछ बड़ा करने नहीं दिया और तुम बहुत सरे कदम उठाने से वंचित रह गए. मैं भी तुम्हारी मज़बूरी को देखती रही और जहर के गुंट पीती रही. हालाँकि मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों के बाद मैं बहुत चिलायी थी कि ये सुनहरा मौका है कुछ बड़ा कर डालो पर तुमने मेरी एक न मानी और एक अपनी असली ताकत दिखाने का एक अच्छा मौका गवां दिया. कितने बड़े बड़े पुलिस अधिकारी कुर्बान हो गए पर तुमने कुछ नहीं किया/ फिर बयां बजी करते वक्त मैंने तुमेह बहुत रोअक पर तुमने मेरी एक न सुनी और वाही घिसे पिटे बयां देते रहे कि हम आतंकवाद से डरने वाले नहीं है, आतंकवाद का डटकर मुकाबला करेंगे, दोषियों को बक्शा नहीं जायेगा. आज लगभग तीन बरस होने वाले हैं और आज तक दोषियों को कोई सजा नहीं मिली है. हाँ तुमने अमरीका से ज़रूर गुहार लगाई लेकिन क्या मिला. तुम्हें मैंने कितना कहा कि ऐसे गिडगिडाने से कुछ मिलने वाला नहीं है. मनमोहन तुम्हे कुछ कठोर निर्णय तो लेने ही होंगे, कुछ कदम स्वयं उठाने ही होंगे
घोर आश्चर्य ! तुम्हारा नया कार्य काल तो समझ ही नहीं आता कि तुम कर क्या रहे हो? घोटालों पर घोटाले हुए जा रहे है और तुम कहते रहते हो कि तुम्हे कुछ नहीं पता है.दाढ़ी वाले कलमाड़ी साहब ने राष्ट्र मंडल खेलों में हजारों करोड़ों का घोटाला किया पर तुम्हे कुछ नहीं पता. द्रमुक के राजा नाम से तो राजा कहाते रहे और निकले घोटालों के राजा. २ जी स्पेक्टरुम के बाद एस स्पेक्टरुम में निकला घोटाला पर तुम्हारे क्या कहने वही जवाब " कोई घोटाला नहीं है " या फिर " मुझे कुछ पता नहीं है ". गठबंदन के दबाव में तुमने राजा कि बहुत सी बातें चुपचाप सही पर जब सारे विपक्ष ने पर्दाफाश किया तो तुमने उसे हटने को कहा. कम से कम विपक्ष का मुहं बंद करने के लिए ही सही जे पी सी कि मांग स्वीकार कर लेते तो कुछ तो शांति होती और तुम्हारी भी छवि अच्छी रहती पर लगता है उसमें भी तुम्हे आला कमान कि स्वीकृति कि ज़रूरत महसूस होती है. अंतत: तुमने जे पी सी की मांग को स्वीकार भी सही लेकिन पूरा एक सत्र ख़राब करने के बाद.
इतने बड़े घोटालों के सामने आदर्श घोटाला बहुत छोटा लगता होगा. महाराष्ट्र में यशवंत सोनवाने को जिंदा जला दिया गया तुम्हे क्या फरक पड़ा.ऐसा तो आम आदमी के लिए बहुत ही आम है. आम आदमी से याद आया कि बिचारा आम आदमी तो इन हजारों लाखों करोड़ों के घोटालो को तो वो आज नहीं तो कल भूल ही जायेगा क्योकि ये तो वो पीदियों से करता आ रहा है. बोफोर्स, चारा घोटाला, हवाला कांड, प्रश्न के लिए पैसा, बंगारू बाबु का केमरे के सामने पैसा लेना अब किसे याद रहा है. आम आदमी भली भांति जानता है कि ये तो बड़े लोगन कि बड़ी बाते है दो चार साल सीबीआई की जांच चलेगी फिर वही बस्ता बंद. और उसके बाद सब जस का तस हो जायेगा
पर प्यारे मन मोहन तुम तो खुद धरातल से उठकर ऊपर पहुंचे हो. तुम आम आदमी के दर्द को कैसे भूल गए. आम आदमी महंगाई के भरी बोझ तले पिसता चला जा रहा है. पेट्रोल की कीमत बेतहाशा बदती जा रही है. रोज़मर्रा के काम आने वाली छीजे दालें, सब्जियां सब महंगे होते जा रहे है. गरीब और मध्यम वर्ग के लिए जीना दूभर हो गया है. महंगाई दिन ब दिन सुरसा की तरह बदती चली जा रही है. तुम तो स्वयं इतने बड़े अर्थशास्त्री हो . हर हफ्ते तुम्हारे सरकारी महकमे वाले लोग मुद्रा स्फीति बढती हुई बताते है और तुम कहते हो की महंगाई नहीं बढ रही है. इससे ज्यादा अचम्भा तो तब होता है जब तुम्हारे वित्त मंत्री महोदय प्रणब बाबू कहते हैं की उनके पास कोई जादुई छड़ी नहीं है की वे महंगाई दूर कर सके. प्रणब बाबू की बात से एक और बात यद् आयी की जब भी कोई बड़ी समस्या हॉट है या किसी विदेशी नेता से कोई बात करनी होती है तो तुम नहीं करते हो या फिर आला कमान तुम्हे नहीं भेजकर प्रणब बाबू को ही आगे कर देता है. कभी कभी मेरा मन में भी ये सवाल आता है की प्रधानमंत्री तुम हो या प्रणब बाबू.
खैर मैंने बहुत सारी हिदायतें तुम्हे दे डाली हैं. पहले तो सांसद भी आत्मा की आवाज़ सुनते थे और वोही करते थे जो उनकी आत्मा बोलती थी. अब तो मैं उकता गयी हूँ की तुम मेरी आवाज़ को हमेशा अनसुना कर देते हो. मुझे विश्वास तो पूरा नहीं पर थोड़ी सी आशा ज़रूर है कि तुम भ्रष्टाचार रोकने के लिए, भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने के लिए कुछ अवश्य करोगे. आम आदमी का पूरा ख्याल रखोगे. महंगाई को काबू में करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाओगे .
इसी आशा के साथ तुम्हारी अपनी ही आत्मा
लेबल: मनमोहन की पाती

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